शब-ए-बारात कब है? शब-ए-बारात की क्या है खासियत?

आप तो जानते ही होंगे रज्जब (सातवां) महीने के बाद, शआबान (आठवां) महीना होता है. हिजरी कैलेंडर के अनुसार, शाबान महीने के 14 तारीख की शाम से 15 तारीख के सुबह तक शब-ए-बारात त्यौहार दुनिया भर में मनाया जाता है।

भारत में शबे बरात का त्यौहार 25 फरवरी के शाम को शुरू होगा जो पूरे रात चलेगा। आसान भाषा में कहा जाए तो, 25 फरवरी के मगरिब की नमाज से लेकर 26 फरवरी के फजर की नमाज तक यह त्योहार चलेगा।

14 शआबान कब है?

14 शआबान 25 फरवरी दिन इतवार को है। शबे बरात का त्यौहार 25 फरवरी के शाम से शुरू हो जाएगा।

15 शआबान कब है?

15 शआबान 26 फरवरी दिन सोमवार को है। शबे बरात का रोजा रखने के लिए 26 फरवरी के फजर की नमाज से पहले शेहरी खाया जाता है।

16 शआबान कब है?

16 शआबान 27 फरवरी दिन मंगलवार को है। जो लोग शबे बरात का रोजा रखेंगे, वे लोग 27 फरवरी के मगरिब की अजान के बाद इफ्तार करेंगे।

पिछले 10 सालों के रिकॉर्ड के अनुसार

2016 से 2024 के बीच होने वाले यह त्यौहार का लिस्ट नीचे दिया गया है। लिस्ट को देखने से साफ पता चलता है कि, प्रत्येक वर्ष 11 से 12 दिन पहले यह त्यौहार मनाया जाता है।

2016 – 21 मई
2017 – 12 मई
2018 – 1 मई
2019 – 20 अप्रैल
2020 – 9 अप्रैल
2021 – 28 मार्च
2022 – 18 मार्च
2023 – 7 मार्च
2024 – 25 फरवरी.

शब-ए-बारात दो शब्दों के मेल (शब और बारात) से बना है। शब मतलब रात होता है। जबकि बारात का सही अर्थ बरी होना होता है।

इसे इबादत और गुनाहों का माफी का रात कहा जाता है। मुसलमान अपने गुनाहों की माफी अल्लाह से मांग कर बरी हो सकता है। अगले दिन रोजा रखा जाता है।

India ही नहीं दुनिया भर के मुसलमान शबे बारात की रात को कब्रिस्तान जाकर अपने बुजुर्गों की कब्र पर फातिहा पढ़ते हैं। यही नहीं मज़ारों पर हाज़िरी भी देते है।

मर्द मुसलमान शबे बरात की रात में मस्जिदों में रात भर जाग कर अल्लाह की इबादत करते हैं जगह-जगह जलसे और महफ़िल-ए-मिलाद़ की महफ़िल सजती है।

शब-ए-बारात क्यों मनाया जाता है?

यह तो आप जान चुके होंगे लेकिन आपको यह भी जान लेना चाहिए कि दुनिया वालों ने पहली बार इस त्यौहार को कब मनाया था।

अल्लाह के नबी पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का जन्म में से लेकर पालन-पोषण तक मक्का में हुआ। आपने लोगों को इस्लाम अपनाने के लिए कभी मजबूर नहीं कये थे।

लेकिन आपके कामों ने लोगों को शांति के धर्म के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया। जैसे-जैसे दिन गुजरता गया, वह काफी प्रसिद्ध हो गये। उसकी शिक्षाओं ने एक धर्म के तहत पूरे अरब प्रायद्वीप के एकीकरण को प्रेरित किया।

मक्का के तत्कालीन राजनीतिक शासकों को खतरा महसूस होने लगा। आप पर दबाव बनना शुरू हुआ। जिसने इस्लाम के दूत को पवित्र शहर – मक्का को 622 शताब्दी में छोड़ने के लिए मजबूर किया और मदीना चले गये।

पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अभियान के दौरान, उन्होंने रक्तपात से परहेज किया और कई लोगों को माफी दे दी।

आप 630वीं शताब्दी में मक्का लौटने की यह विशेष रात को मुसलमानों के द्वारा शब-ए-बारात मनाई जाती है। दुनिया भर में रहने वाले मुसलमानों का मानना है कि दुनिया वालों ने पहली बार 630वीं शताब्दी में यह त्यौहार मनाया।

शब-ए-बारात के सही नाम को जान लें

शब-ए-बारात और शबे बरात, के नाम से इंटरनेट पर खोजा जाता है। लेकिन सही नाम क्या है यह आप जान लें। भारतीय उपमहाद्वीप में यह त्यौहार शब-ए-बारात के नाम से जाना जाता है। इस त्यौहार का अरबी नाम लैलतुन निसफे मीन शाबान या लैलतुल बराह कहते हैं।

अक्सर लोग यह जानना चाहते हैं कि मुसलमान शब-ए-बारात क्यों मनाते हैं ?

शब-ए-बारात दो शब्दों के मेल (शब + बारात) से बना है।शब मतलब रात होता है। जबकि बारात का अर्थ बरी होना होता है। यह एक इबादत की रात है जिसमें मुसलमान अपने अल्लाह से गुनाहों की माफी मांगते हैं। गुनाहों की तौबा करते हैं। इस रात को अल्लाह पाक तौबा ज्यादा कबूल करते हैं।

अल्लाह पाक रहमतों व नेकियों के दरवाजे खोल देते हैं। दुनिया में रहमत के फरिश्तों को भेजते हैं। शबे बरात की रात अल्लाह पाक अपने बंदो के लिए रोजी रोटी व मौत हयात आदि का फेहरिस्त तैयार करते हैं।

इस्लाम के चार बड़ी रातों में से एक है शबे कद्र की रात, जान लीजिए

इस्लाम में इबादत करने के अनुसार पहले नंबर पर आशूरा की रात है, दूसरी शब-ए-मेराज, तीसरी शब-ए-बारात व चौथी शब-ए-कद्र होती है। इन रातों की इबादत काफी बेहतर माना जाता है।

शब-ए-बारात की रात में क्या पढ़े और रोजा कब है

शब-ए-बारात की इबादत कैसे करें? शब ए बारात की नमाज़ में मुख्यतः नफल व तहजूद है। शबे बारात की दुआ में अपने और परिवार के लोगों लिए माफी जरूर मांगना चाहिए।

शब-ए-बारात की रात इबादत की रात है। पूरी रात इबादत में ही गुजारना चाहिए। रात के पहले हिस्से में कब्रिस्तान जरूर जाना चाहिए। नफल व तहजूद के नमाज़ के इलावा जो अभी समय बचे उसे तिलावते कुरआन को देना चाहिए।

“मेरे प्यारे दोस्तों अगर मैंने आपको अपने जीवन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चोट पहुंचाई हों। कृपया मुझे माफ कर दें। कृपया मुझे अपनी इबादतों में याद रखें। शब-ए-बारात मुबारक”

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